जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय के समक्ष धरना देकर अपनी मांग को मजबूती से रखा है
यह आंदोलन सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के ऐतिहासिक फैसले के विरोध में है

उत्तर प्रदेश के शिक्षकों ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय के समक्ष धरना देकर अपनी मांग को मजबूती से रखा है। यह आंदोलन सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के ऐतिहासिक फैसले के विरोध में है, जिसमें RTE अधिनियम-2009 के तहत 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को भी टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) पास करना अनिवार्य कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कक्षा 1 से 8 तक के गैर-माइनॉरिटी स्कूलों में कार्यरत सभी शिक्षकों को TET क्वालीफाई करना होगा। जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष से अधिक समय बाकी है, उन्हें 2 वर्ष (सितंबर 2027 तक) की छूट अवधि में TET पास करना अनिवार्य है, अन्यथा नौकरी जारी रखने या प्रमोशन का अधिकार नहीं रहेगा। सेवानिवृत्ति के करीब 5 वर्ष से कम बचे शिक्षकों को TET से छूट है, लेकिन प्रमोशन नहीं मिलेगा।
शिक्षकों का कहना है कि RTE लागू होने से पहले (27 जुलाई 2011 से पूर्व) नियुक्त हजारों शिक्षकों ने उस समय की सभी योग्यताएं पूरी की थीं और दशकों से सेवा दे रहे हैं। अब TET को अनिवार्य बनाना उनके साथ अन्याय है, क्योंकि यह पुरानी नियुक्तियों पर पूर्वव्यापी प्रभाव डालता है। इससे लाखों शिक्षकों की नौकरी और प्रमोशन पर खतरा मंडरा रहा है।
Teachers Federation of India के बैनर तले देशभर में शिक्षक आंदोलनरत हैं। वे केंद्र सरकार से RTE अधिनियम में संशोधन कर पुरानी नियुक्तियों को TET से स्थायी छूट देने की मांग कर रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन सहित कई राज्य सरकारें भी केंद्र से यही अपील कर चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में भी शिक्षक संगठन संसद में संशोधन की मांग को लेकर सोशल मीडिया पर #JusticeForTeachers जैसे अभियान चला रहे हैं।
आज आगरा जिले में शिक्षकों ने जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा है, जिसमें केंद्र से अध्यादेश या विधेयक लाकर पुराने शिक्षकों को TET से मुक्ति देने की अपील की गई है। शिक्षकों का मानना है कि उनका अनुभव और समर्पित सेवा TET से अधिक महत्वपूर्ण है, और यह फैसला शिक्षा व्यवस्था में अस्थिरता पैदा कर सकता है।
शिक्षक समुदाय ने अपील की है कि सरकार उनकी लंबी सेवा और योगदान को सम्मान दे और TET की अनिवार्यता पर पुनर्विचार करे, ताकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रभावित न हो।



