संत गोरा कुम्हार की भक्ति और कर्मयोग की लीला का मंचन, प्रेम, विनम्रता और श्रद्धा ही मनुष्य की सच्ची महानता पुलिन बिहारी जी
गोरा कुम्हार जी अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए मिट्टी के बर्तन बनाते थे। वे मिट्टी गूंथते, चाक पर घड़े बनाते और निरंतर भगवान विट्ठल का नाम स्मरण करते रहते थे।

अलीगढ़, की पावन लीला में संत शिरोमणि गोरा कुम्हार जी की कथा का भावपूर्ण मंचन किया गया। कथा वाचक श्री पुलिन बिहारी जी ने बताया कि गोरा कुम्हार जी अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए मिट्टी के बर्तन बनाते थे। वे मिट्टी गूंथते, चाक पर घड़े बनाते और निरंतर भगवान विट्ठल का नाम स्मरण करते रहते थे।
उनकी भक्ति का मुख्य संदेश यही है कि ईश्वर की आराधना केवल मंदिर में ही नहीं, बल्कि अपने दैनिक कर्मों को पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करते हुए भी की जा सकती है।
श्री पुलिन बिहारी जी ने बताया कि एक बार गोरा कुम्हार जी मिट्टी तैयार करते समय विट्ठल भजन में इतने तल्लीन हो गए कि उन्हें आसपास का ध्यान नहीं रहा। इसी दौरान उनका छोटा बच्चा दुर्घटनावश मिट्टी में दब गया। उनकी पत्नी संती यह दृश्य देखकर अत्यंत दुखी हुईं और दुख में उन्होंने गोरा कुम्हार जी को स्पर्श न करने की और विट्ठल की शपथ दिला दी। गोरा कुम्हार जी ने उस शपथ को गंभीरता से लिया, जिसके बाद उनके वैराग्य और परिवार के कठिन समय की कथा आगे बढ़ती है।
लीला के अगले प्रसंग में संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव और अन्य संत गोरा कुम्हार जी से मिलने आते हैं। संतों के अनुरोध पर गोरा कुम्हार जी मिट्टी के घड़े को थाप देकर परखने की तरह ही संतों की आध्यात्मिक परिपक्वता को परखने का प्रतीकात्मक अभिनय करते हैं। जब संत नामदेव



