शाही जामा मस्जिद में 1857 के शहीदों को नमन, मौलाना अब्दुल जलील समेत 73 शहीदों की कुर्बानी को किया याद
अलीगढ़ की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद में आज 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई

अलीगढ़ की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद में आज 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। सिटिजन सोसायटी और जामा मस्जिद कमेटी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में अलीगढ़ के एसपी नीरज कुमार जादौन मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। उन्होंने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व महापौर मोहम्मद फुरकान ने की।अलीगढ़ की शाही जामा मस्जिद सिर्फ इबादतगाह नहीं, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की अहम गवाह भी है।1857 में जब मेरठ से आजादी की चिंगारी देशभर में फैली, तो अलीगढ़ भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। शाही जामा मस्जिद के इमाम और मदरसा इस्लामिया अरबिया के प्रधानाचार्य मौलाना अब्दुल जलील ने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के लिए एकजुट किया।ऐतिहासिक विवरणों में मौलाना अब्दुल जलील और मुजफ्फर अली की ओर से अंग्रेजी शासन के खिलाफ फतवा जारी किया गया, अंग्रेज अधिकारियों के अलीगढ़ छोड़ने के बाद स्थानीय लोगों, व्यापारियों और जमींदारों ने मिलकर व्यवस्था संभाली और हिंदू-मुस्लिम समाज ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साझा संघर्ष किया।इसी दौरान अंग्रेजी सेना ने दोबारा अलीगढ़ और आसपास के इलाकों में कार्रवाई शुरू की।
खैर, टप्पल, मडराक, हाथरस और सासनी में संघर्ष हुए।ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 24 अगस्त 1857 को मडराक क्षेत्र में मौलाना अब्दुल जलील और उनके साथियों ने अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। भीषण संघर्ष में मौलाना अब्दुल जलील समेत 72 साथी शहीद हो गए।यानी मौलाना अब्दुल जलील समेत कुल 73 शहीदों की कुर्बानी अलीगढ़ के इतिहास का अहम हिस्सा है।इन शहीदों को शाही जामा मस्जिद परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। यहां मौजूद कब्रों को स्थानीय तौर पर ‘गंज-ए-शहीदां’ के नाम से जाना जाता है।इन्हीं शहीदों की याद में सिटिजन सोसायटी और शाही जामा मस्जिद कमेटी ने श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया। एसपी नीरज कुमार जादौन ने शहीदों को नमन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व महापौर मोहम्मद फुरकान ने की, जबकि संयोजक और जामा मस्जिद के सचिव मोहम्मद अहमद शेवन ने सभी का आभार जताया।कार्यक्रम में डॉक्टर राहत अबरार, डॉक्टर रेहान अख्तर कासमी और जामा मस्जिद के इमाम मुफ्ती महमूद उल हसन कासमी मुख्य वक्ता के तौर पर मौजूद रहे।मौलाना अब्दुल जलील और उनके साथियों की शहादत सिर्फ 73 लोगों की कुर्बानी नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अलीगढ़ की एकता, हिम्मत और साझा प्रतिरोध की कहानी है।शाही जामा मस्जिद का गंज-ए-शहीदां आज भी उन शहीदों की कुर्बानी की गवाही दे रहा है।



