बेटियों ने निभाया बेटे का फर्ज, बड़ी बेटी ने दी पिता को मुखाग्नि — समाज को दिया प्रेरणादायक संदेश
हैंड्स फॉर हेल्प सामाजिक संस्था, अलीगढ़ की सदस्य हैं तथा समाजसेवा के विभिन्न कार्यों में निरंतर अपना योगदान देती रही

अलीगढ़। बदलते समय में बेटियां हर क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रही हैं। इसी का एक प्रेरणादायक उदाहरण केवल विहार कॉलोनी, अलीगढ़ में देखने को मिला, जहां स्वर्गीय चंद्र दत्त जी के निधन के उपरांत उनकी चारों बेटियों ने पुत्र धर्म निभाते हुए समाज के समक्ष एक नई मिसाल प्रस्तुत की।स्वर्गीय चंद्र दत्त जी का कोई पुत्र नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी चारों पुत्रियों श्रीमती नीरज रानी, श्रीमती रेनू, श्रीमती रूबी एवं मोनिका को पुत्रों के समान शिक्षा, संस्कार और अवसर प्रदान किए। उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया तथा जीवन मूल्यों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सेवा भाव के श्रेष्ठ संस्कार दिए। अपनी बेटियों ने भी जीवनभर पुत्र की तरह अपने पिता का ख्याल रखा, उनकी सेवा की और हर परिस्थिति में उनका साथ निभाया। पिता के निधन के बाद उनकी सबसे बड़ी पुत्री श्रीमती नीरज रानी ने सामाजिक रूढ़ियों एवं परंपरागत सोच से ऊपर उठकर अपने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार किया। अंतिम यात्रा के दौरान चारों बेटियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया। इस भावुक और प्रेरणादायक क्षण में उनके दामादों ने भी पूर्ण सहयोग एवं समर्थन प्रदान किया। उल्लेखनीय है कि बड़ी पुत्री श्रीमती नीरज रानी सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। वह हैंड्स फॉर हेल्प सामाजिक संस्था, अलीगढ़ की सदस्य हैं तथा समाजसेवा के विभिन्न कार्यों में निरंतर अपना योगदान देती रही हैं। उनके पति सुनील कुमार, संस्था के अध्यक्ष हैं, जो लंबे समय से सामाजिक सरोकारों एवं जनसेवा के कार्यों में सक्रिय हैं।अंतिम संस्कार के दौरान उपस्थित लोगों ने बेटियों के इस साहसिक एवं संवेदनशील कदम की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश बताया। परिजनों ने कहा कि बेटियां आज किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। वे परिवार की हर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं और आवश्यकता पड़ने पर अंतिम संस्कार जैसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों का भी पूर्ण निष्ठा के साथ निर्वहन कर सकती हैं।यह घटना उन परिवारों और बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो पुत्र न होने की स्थिति में सामाजिक दबाव या परंपराओं के कारण स्वयं को असहज महसूस करते हैं। स्वर्गीय चंद्र दत्त जी की बेटियों ने यह सिद्ध कर दिया कि रिश्तों की गरिमा और कर्तव्य का संबंध लिंग से नहीं, बल्कि प्रेम, संस्कार, समर्पण और जिम्मेदारी से होता है।
संदेश :”जब बेटियां जीवनभर माता-पिता की सेवा कर सकती हैं, तो उनके अंतिम संस्कार का पवित्र दायित्व भी निभा सकती हैं। बेटियां केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि पूरे परिवार का गौरव, सम्मान और संबल होती हैं।”



